क्या वास्तव में ऐसा है या इसका हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, जिस सरकार को देखो अपने राज्य में कम से कम कुछ जिलों को ही सही नक्सल प्रभावित बताने पर तूला हुआ है यह क्या है ? क्या नक्सलवाद का यह व्यापारी कारण है ? यदि नहीं तो जिस राज्य में छुट पुट वारदातें हो उन्हें बंद नहीं करवा सकते और केंद्र सरकार से मदद की चाह में यह सब कार रहे हैं. नक्सलवाद का भी बाजारीकरण हो गया है इसके नाम से जो सरकारी पैसे खर्च किये जा रहे हैं इसका हिसाब कोई ले रहा है ? और जिस काम के लिए यह पैसा आ रहा है क्या सही मायने में उसी पर खर्च हो रहा है ?
झारखण्ड में नक्सलियों की सामानांतर सरकार चलती है वहां जितने पैसे सरकार नक्सलियों से लड़ने और विकास कार्य में खर्च करने को देती है सब का बंदरबांट होता है यही कारण है की उसके साथ बने उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ तो विकास के दौड़ में काफी आगे निकल गए पर झारखण्ड आज भी वहीँ खड़ा है जहाँ पहले खड़ा था..........फिर बिहार से अलग राज्य बनाने का क्या मतलब ?नक्सलबाड़ के बाजार में खड़ा दूसरा प्रदेश छत्तीसगढ़ जो राज्य की दूसरी समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाने के लिए नक्सलबाड़ का दूकान खोलकर केंद्र से पैसे बनाने में जुटा है , जबकि प्रदेश में अन्य योजनाओं का बुरा हाल है. आम लोगों की आवाज़ कहीं कोई सुन न ले इस लिए बाजार में खड़े होकर जोर-जोर से नक्सल-नक्सल चिल्ला रहे हैं.
सत्ता के बाजीगरों से निवेदन है इस समस्या के तह में जाकर सुलझाईये ! इसके जड़ में मत्था डालिए , यह निश्चित कीजिये की किसी गरीब को सताया नहीं जाये, शोषण न हो, अत्याचार कहीं हो न जाये तब जाकर यह समस्या सुलझेगी भाई साहब ! गरीबों का चावल यदि सेठ खायेगा और उद्योग पति शोषण करेगा तथा आपके पिट्ठू अत्याचार करेंगे तो नक्सलबाड़ बढेगा ही क्योकि यह सब इसके लिए खाद पानी का काम करते है.